Yoga Principle defines System of Yoga. First step is yoga initiation, second step is hearing or study thrid step is contemplation, fourth step is meditation and fifth is samadhi or realization of supreme self Yoga Initiation or Diksha is the first step of yoga principle in which guru transmits power in student to cut his illusionsecond step of yoga principle is Hearing or Study holy books to know the godthird step of yoga principle is contemplation in which devotee contemplate on what he heard and/or studied about god and how to know the supreme self (the God)Fourth step of Yoga principle is meditation in which devotee meditate of verses, form of god etc to realize the God      fifth and the last step of Yoga Principle is realization of Supreme Self or God

 

 

प्रेम ही ईश्वर है

Love is God.

God is Love.

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समय संस्कार

(समयाचार की दीक्षा विधि)

समय संस्कार उस कर्म का नाम है जिसके माध्यम से गुरु शिष्य के अंतःकरण की शुद्धि करके उसे पाश्बंधन से मुक्त करते हैं.

इसके लिए गुरु अपने शिष्य को लेकर सर्वप्रथम ईश्वर की पूजा करते हैं. फिर वे गुरु अपने शिष्य पर अनुग्रह (कृपा) की इच्छा मन में धारण करके ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना करते हैं कि :-

"हे प्रभु! प्रसन्न होइए! हे दयानिधे! मेरे शारीर में प्रवेश करके आप कृपापूर्वक इस शिष्य को बंधनमुक्त करिए."

इसके बाद "मैं ऐसा ही करूंगा" इस प्रकार कि ईष्ट देव कि अनुमति पाकर गुरु उस विरक्त शिष्य को अपने निकट आसन पर बैठाते हैं. फिर ईष्ट देव कि आराधना करके "मैं ईष्ट देव (ईश्वर) हूँ" इस अभिमान से युक्त गुरु ईष्ट के तेज से संपन्न अपने हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखते हैं और ईष्ट देव के मंत्र का उच्चारण करते हैं.  उसी हाथ से वे शिष्य के संपूर्ण अंगों का स्पर्श करते हैं. शिष्य भी आचार्य रूप में उपस्थित हुए ईश्वर को पृथ्वी पर लेटकर साष्टांग प्रणाम करते हैं.

इसके बाद गुरु प्राण वायु का रेचन करके (बहार छोड़कर) शिष्य के शारीर में प्रवेश कि भावना करते हैं. फिर भावना द्वारा शिष्य के मन में वैश्यत्व, क्षत्रियत्व, ब्राह्मणत्व कि भावना को क्रमानुसार उत्पन्न करके शांत करते हैं.  अर्थात, वैश्यत्व कि भावना निकालकर क्षत्रियत्व की भावना उत्पन्न करते हैं और फिर क्षत्रियत्व की भावना निकालकर ब्राह्मणत्व की भावना उत्पन्न करते हैं. इसके बाद ब्राह्मणत्व की भावना निकालकर ईश्वरत्व की स्थापना करते हैं.  जाति के अनुसार वैश्य शिष्य में वैश्यत्व से क्षत्रियत्व, क्षत्रियत्व से ब्राह्मणत्व और फिर ब्राह्मणत्व से ईश्वरत्व की भावना स्थापित करते हैं. क्षत्रिय शिष्य में क्षत्रियत्व से ब्राह्मणत्व और फिर ब्राह्मणत्व से ईश्वरत्व की स्थापना करते हैं. ब्राह्मण शिष्य में केवल ईश्वरत्व की ही स्थापना करते हैं.  फिर गुरु शिष्य के आग की चिंगारियों के सामान ईश्वर रूप आत्मा को अपने आत्मा में स्थित होने की भावना करते हैं.  फिर उसी नाडी से गुरु मंत्रोच्चारण करते हुए प्राण वायु बाहर निकालते हैं और उसी नाडी के द्वारा ही शिष्य के हृदय में प्रवेश करते हैं.  शिष्य के हृदय में प्रवेश करके उसके चेतन का नीले बिंदु के समान चिंतन करते हैं, साथ ही यह भावना करते हैं की मेरे तेज से इसका सारा मल नष्ट हो गया है और यह शिष्य पूर्णतः प्रकाशित हो रहा हैं.  इसके बाद गुरु नीले बिंदु स्वरुप शिष्य के चैतन्य को लेकर नाडी से संहार मुद्रा एवं प्राणायाम द्वारा अपने आत्मा से जोड़कर एक कर लेते हैं.  इसके बाद ईष्ट देव के ध्यान व मंत्र पाठ के साथ शिष्य का अभिषेक करते हैं. इसके बाद शिष्य को नवीन वस्त्र धारण कराया जाता है.

इसके बाद ईश्वर रूप गुरु मातृकान्यास करते हुए शिष्य के मस्तक पर ईष्ट देव के आसन का ध्यान करते हैं और वहां ईष्ट देव का आह्वान करके यथोचित रीति से उनकी मानसिक पूजा करते हैं. और तब हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं :-  "प्रभो! आप नित्य यहाँ विराजमान हों." इस प्रकार प्रार्थना करके गुरु मन-ही-मन यह भावना करते हैं कि शिष्य ईष्ट देव के प्रकाश से पूर्णतः प्रकाशित हो रहा है. इसके बाद पुनः ईष्ट देव की पूजा करके ईष्ट देव की आज्ञा प्राप्त करके गुरु शिष्य के कान मैं धीरे-धीरे ईष्ट देव के मंत्र का उच्चारण करते हैं. और शिष्य धीरे-धीरे उस मंत्र की आवृत्ति करता है और ईष्ट देव में मन लगाता है.

फिर शिष्य गुरु की आज्ञा से ईष्ट देव, अग्नि तथा गुरु के समीप भक्ति-भाव से युक्त होकर प्रतिज्ञा के रूप में दीक्षावाक्य का उच्चारण करता है :- "मेरे लिए प्राणों का परित्याग कर देना अच्छा है किन्तु मैं भगवान् की पूजा किये बिना कभी भोजन नहीं कर सकता."

इस प्रकार नियम लेकर, जब तक मोह दूर न हो जाए, तब तक वह शिष्य ईष्ट देव में ही निष्ठा रखकर, उन्हीं के आश्रित होकर, उनकी आराधना करता रहता है. ऐसा करने से वे ईश्वर स्वयं ही उसे योगक्षेम प्रदान करते हैं यानी अपने स्वरुप का (परमात्मा का) बोध करा देते हैं.

भगवन श्री कृष्ण ने गीता में कहा है :-

"अनन्याश्चिन्तयन्तो माम ये जनाः पर्युपासते |

तेषाम नित्याभियुक्तानाम योगक्षेमं वहाम्यहम" || ९.२२||

अर्थात, अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए जो मेरे भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर प्रेम से चिंतन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले भक्तों का योग (भगवत स्वरुप की प्राप्ति), क्षेम (भगवत-प्राप्ति के निमित्त किये हुए साधन की रक्षा) मैं स्वयं करा देता हूँ.

ऐसा करने से उस शिष्य का नाम "समय" हो जाता है इसलिए इसे समय संस्कार भी कहते हैं. "स" अर्थात ईश्वर, मय अर्थात "से युक्त" इस प्रकार समय का अर्थ है "ईश्वर से युक्त". इसके बाद गुरु करन्यास करते हुए मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए ईश्वर की प्रतिमा, माला, पूजा, होम, जप एवं ध्यान के साधन शिष्य को प्रदान करते हैं.  वह शिष्य बड़े आदर के साथ उन्हें ग्रहण करता है और अपनी रूचि के अनुसार मठ में या घर में ही ईश्वर का पूजन करता रहता है. गुरु के आदेश से ही शिष्य ईश्वर की कथा व ग्रंथों आदि का श्रवण, पठन, मनन व ध्यान आदि करता है.

यदि कोई गुरु उपलब्ध नहीं हो, तो साधक अपने ईष्ट देव को ही अपना गुरु मानकर उनकी आराधना प्रारम्भ करे. जो साधक समस्त कर्मों से विरक्त हो गया हो, उनमे दुःख-बुद्धि रखता हो, भगवन की लीला के प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग एवं वासनाएं दुःख-रूप हैं, किन्तु इतना जानकर भी जो उनका त्याग करने में समर्थ न हो, उसे चाहिए कि उन भोगों को तो भोग ले किन्तु उन्हें सच्चे हृदय से दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निंदा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे.  साथ ही इस दुविधा की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए पूरी श्रद्धा, दृढ निश्चय एवं प्रेम से भगवान् का भजन करे. और भगवन से यह प्रार्थना करे कि 'हे प्रभु! प्रसन्न होइए! हे दयानिधे! मेरे शारीर में प्रवेश करके आप कृपापूर्वक मुझे इस बंधन से मुक्त करें.' इस प्रकार प्रेम और भक्तिपूर्वक ईश्वर का भजन करने से वे भगवन साधक के हृदय में आकर बैठ जाते हैं और हृदय में बैठते ही साधक के हृदय की सारी वासनाएं संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती हैं. और जब उस साधक को परमात्मा का साक्षात्कार होता हैं तो उसके हृदय की गांठ टूट जाती है और उसके सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और कर्म वासनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती है. (श्रीमद्भागवत, एकादश स्कंध, अ. २०, श्लोक २७-३०)

गीता में भी भगवन श्री कृष्ण ने दीक्षा के स्वरुप का वर्णन इस प्रकार किया है :-

"अहम् सर्वस्य प्रभावो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्त्वा भजन्ते माम बुधा भावसमन्विताः ||

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परं | कथयन्तश्च माम नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ||

तेषाम सततयुक्तानाम भजतां प्रीतिपूर्वकम | ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ||

तेषामेवानुकाम्पार्थमहंज्ञानजमतमः | नाशयाम्यभावास्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ||

(अ. १०, श्लोक ८ से ११)

"अर्थात, मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ, और मेरे से ही सब जगत चेष्टा करता है, इस प्रकार तत्त्व से जानकार श्रद्धा एवं भक्ति से युक्त होकर, जो बुद्धिमान भक्त मुझ परमेश्वर का निरंतर भजन करते हैं, वे निरंतर मरे में ही मन को लगाने वाले और मेरे में ही प्राणों को लगाने वाले भक्तजन सदा ही मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को एक दूसरे को जनाते हुए मेरी कथा में ही संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव का ही सदा स्मरण ध्यान करते रहते हैं. उन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए मैं स्वयं उनके अंतःकरण में एकीभाव से स्थित हुआ, अज्ञान से उत्पन्न हुए अन्धकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ."

इस प्रकार भगवान के किसी भी स्वरुप को गुरु मानकर आराधना करने पर एवं प्रार्थना करने पर जब हृदय में उनका थोडा सा भी अनुभव होने लगे तो उन भगवान् से प्रार्थना करें कि :- "प्रभो!अब आप नित्य यहाँ विराजमान हों." इसके बाद मन ही मन भावना करें कि भगवन के तेज से मैं पूर्णतः प्रकाशित हो रहा हूँ. तब भक्त के अंतःकरण को भगवन अन्तः प्रेरणा, अंतर्ज्ञान एवं अनेकानेक साधनों से शुद्ध करते हैं. भक्त को चाहिए कि वह भगवन के उन संकेतों को समझकर उसके अनुसार कार्य करे.

दीक्षा में इसके बाद षडध्वशोधन किया जाता है. इसे भूतशुद्धि भी कहा जाता है.

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भूतशुद्धि की विधि (षडध्वशोधन विधि)

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